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ADA क्या है

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Cardano Case Study in Hindi | निवेश करने से पहले Ada के बारे मे सबकुछ जाने।

Cardano दुनिया की 9 वी सबसे बड़ी डिसेंट्रलाइज क्रिप्टोकरेंसी है । इस कॉइन की कीमत में काफी उतार – चढ़ाव देखने को मिला है। यह कॉइन Proof of Stake पर काम करता है। अब ये PoS क्या होता है , इस कॉइन का इतिहास कैसा रहा है , यह पॉपुलर कैसे हुआ , इस कॉइन में अगर शुरुआत में 10,000 रुपये लगाए होते तो कितना होता , इस कॉइन का भविष्य कैसा होने वाला है। आज के इस पोस्ट ( Cardano Case Study in Hindi ) आपको इन सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे । चलिए पढ़ना शुरू करते हैं:-

Table of Contents

Cardano क्या है?

Cardano एक डिसेंट्रलाइज open source क्रिप्टोकरेंसी है । इसका दूसरा नाम Ada है । यह प्रूफ ऑफ स्टेक ( PoS ) पर काम करता है। इस समय इसकी कीमत 74 रुपये के आस पास है और इसकी टोटल सप्लाई 45 बिलियन है ।

कठिन शब्द का मतलब

  • डिसेंट्रलाइज :-मतलब इसपर किसी भी सरकार , बैंक या किसी भी संस्था का कंट्रोल नही है । इसका owership इससे जुड़े सभी लोगो के पास होता है।
  • Open Source :- मतलब इसका कोड दुनिया के सभी लोगो के लिए खुला है।
  • Proof of Stake ( PoS ) :- इसमे माइनर को अपना क्रिप्टोकरेंसी नेटवर्क में स्टेक करना होता है और इसमे से किसी भी एक माइनर को randomly चुना जाता है ताकि वो ब्लॉकचैन में जुड़ने वाले transaction को varify कर सके। जो माइनर इसे verify करता है उस miner को बदले में रिवॉर्ड दिया जाता है।

Cardano की बनाने की कहानी

Cardano कॉइन के फाउंडर का नाम चार्ल्स हॉकिंसन है जो पहले Ethereum के Co-Founder भी रह चुके हैं । जब ये Ethereum के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे तो विटालिक वुटेरिन ( Ethereum के फाउंडर ) से इनकी किसी बात को लेकर मतभेद हो गयी । फिर उसके बाद ये दोनों अलग हो गए।

फिर बाद में इन्होंने अपने पुराने दोस्त जेरेमी वुड के साथ मिलकर 2015 में एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया । इस प्रोजेक्ट का नाम इनपुट आउटपुट हांगकांग रखा गया।

और इनके इन्ही प्रोजेक्ट में से एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट Cardano है , जिसे 27 सितम्बर 2017 को इसका खुलासा किया ADA क्या है गया फिर 1 october 2017 को इसे लोगो के सामने पेश किया गया। आज यह कॉइन किस मुकाम तक पहुँच गया है यह किसी से छुपा नही है ।

Price History of Cardano ( हिंदी में )

चलिए जानते हैं की इस कॉइन की कीमत कब कितनी थी ।

Cardano को 1 october 2017 को लांच किया गया , उस समय इस कॉइन की कीमत मात्र 1.38 रुपये थी । उसके बाद मात्र तीन महीने में ही इस कॉइन की कीमत 75 रुपये तक चली गयी । लेकिन फिर समय के साथ धीरे धीरे इस कॉइन की कीमत गिरती चली गयी और गिरकर यह 10 रुपये पर आ गया। बाद में इस कॉइन की कीमत और गिर गयी और यह 3 रुपये पर आ गया । लगभग 15 महीनों तक इस कॉइन की कीमत इसी के आस पास घूमती रही ।

लेकिन 2021 में तो इस कॉइन ने धमाल मचा रखा था , मार्च 2021 में इसकी कीमत 80 रुपये तक चली गयी थी और सितंबर 2021 में इस कॉइन ने अपना सबसे ज्यादा कीमत हो छुआ जो कि 225 रुपये के आस पास थी । लेकिन आज यह 72 रुपये के आस पास घूम रहा है।

महत्वपूर्ण सारणी

  • नाम – Cardano
  • वेबसाइट – CARDANO
  • नीक नाम – ADA
  • मार्केट रैंकिंग – 9th
  • मार्केट कैप – 2 लाख 31 हजार रुपये
  • All time high – 225 रुपये
  • All time low – 1.38 रुपये
  • रिस्क – कम है।
  • भविष्य – काफी सुनहरा माना जा रहा है।
  • Avalaible Supply – 32 बिलियन है जो अभी मार्केट में आ चुकी है।
  • Total supply – 45 बिलियन
  • मार्केट डोमिनांस – 1.68 %

ये सभी जानकारी 2 मार्च 2022 तक कि है ।

Cardano इतने कम समय में चर्चित कैसे हुआ?

Cardano कॉइन के चर्चित होने के दो महत्वपूर्ण कारण है :-

  1. यह कॉइन Proof of stake पर काम करता है और बिटकॉइन के मुकाबले 99% कम बिजली का उपयोग करता है । यह फीचर इसे काफी लोकप्रिय बनाती है ।
  2. दूसरा सबसे बड़ा कारण है – यह बिटकॉइन और Ethereum के मुकाबले बहुत ही तेज है । जहाँ बिटकॉइन 1 सेकंड में 7 transaction ही करता है , Ethereum 1 सेकंड में मात्र 29 trnasaction ही validate करता है लेकिन वही Cardano मात्र 1 सेकंड में 266 transaction करने में ADA क्या है सक्षम है ।
  3. लांच होने के कुछ महीनों बाद ही इसकी कीमत में काफी ज्यादा तेजी देखने को मिली जिससे बाद में ढेर सारे लोग इस कॉइन से जुड़ते चले गए।

Cardano में 10,000 रुपये लगाए होते तो अभी कितना होता ?

दोस्तो जब यह कॉइन लांच हुआ था तो इस कॉइन की कीमत मात्र 1.38 रुपये थी जो आज यह 72 रुपये पर पहुँच गया है । अगर आप इस कॉइन में 10,000 रुपये लगाए होते तो आज वो 5,13,000 रुपये हो गए होते। लेकिन दोस्तो ये पूरा सच नही है , कुछ महीने पहले इस कॉइन की कीमत 225 रुपये थी , जो अभी तक इस कॉइन की सबसे ज्यादा कीमत है । तो इसके अनुसार से तो उस समय 16 लाख रुपये होते।

Cardano का भविष्य कैसा माना जा रहा है?

एक्सपर्ट का कहना है की इस कॉइन का भविष्य काफी अच्छा है क्योंकि cardano आने वाले नई नई समस्याओं को हल कर रहा है और इस कॉइन के फाउंडर और ADA क्या है सीईओ बहुत ही अनुभवी है । जो इस कॉइन में चार चांद लगती है ।

अभी इस कॉइन का इन 5 phase में काम हो रहा है जो कुछ सालों में पूरा हो जाएगी । जिनमे से तीन phase अभी पूरा हो चुका है । चलिए इन पांचों फेज को बारी बारी से जान लेते हैं :-

  1. Byron :- इस फीचर को कॉइन के लांच होने के साथ ही जोड़ दिया गया था , जिससे लोग Cardano में अपने पैसे का आदान प्रदान कर पाए।
  2. Shelly :- इस फीचर को 2020 में भी जोड़ दिया था जिसके द्वारा यह Proof of Stake को सपोर्ट करने लगा। इसकी सहायता से यह कॉइन बिटकॉइन से 99 % कम बिजली का उपयोग करता है।
  3. Goguen :- अपने तीसरे ADA क्या है फेज में यह कॉइन स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को भी सपोर्ट करने लगा । जिसकी सहायता से इस पर NFT और app बनाए जा सकते हैं।
  4. Rasho :- यह फीचर cardano कॉइन में Scaliblity प्रदान करेगा। लेकिन अभी ये फीचर नही आया ADA क्या है है।
  5. Voltaire :- इस फीचर के आने के बाद लोग इस कॉइन में होने वाले बदलाव के लिए अपना वोट रख पाएंगे।

निष्कर्ष

उम्मीद है दोस्तो की आपको यह पोस्ट बहुत ही पसंद आया होगा । आपने इस पोस्ट ( Cardano Case Study in Hindi ) मे cardano कॉइन से जुड़े अधिकतर सवालों का जवाब मिल गया होगा। अगर फिर भी कुछ छूट गया तो आप हमें कमेंट करके बता सकते हैं । हम उसे जल्दी ही इस पोस्ट में जोड़ने की कोशिश करेंगे । अपने दोस्तों को इस पोस्ट का लिंक भेजने के लिए धन्यवाद

बच्चे ही नहीं बड़े भी हैं ADA-2 बीमारी से ग्रस्त, शोध में हुआ खुलासा

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एडीए-2 नामक दुर्लभ बीमारी को लेकर चंडीगढ़ पीजीआई के डॉक्टरों ने रिसर्च की. रिसर्च में सामने आया कि इस बीमारी से सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि 40 साल तक की उम्र के लोग ग्रसित हैं.

चंडीगढ़: पीजीआई के स्पेशलिस्ट डॉक्टर ने एडीए-2 नामक दुर्लभ बीमारी को लेकर रिसर्च की है. रिसर्च के मुताबिक अभी पूरी दुनिया में इस बीमारी को सिर्फ बच्चों तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन रिसर्च में खुलासा हुआ है कि इस बीमारी से बच्चे ही नहीं बल्कि 40 साल की उम्र के लोग पीड़ित हैं.

इस बीमारी के बारे में जनरल मेडिसन के प्रो. अमन शर्मा ने कई अहम बातों का उल्लेख किया. वहीं अमेरिकन कॉलेज ऑफ रह्युमेटोलॉजी के जर्नल अर्थराइटिस एंड रह्युमेटोलॉजी में 6 सितंबर को उसका ऑनलाइन पब्लिेशन भी हो चुका है.

पीजीआई के इंटरनल मेडिसिन के रूमेटोलॉजिस्ट प्रोफेसर अमन शर्मा की नेतृत्व में हुई इस रिसर्च को लेकर पीजीआई डायरेक्टर प्रो. जगतराम ने भी प्रो. अमन और उनकी टीम के काम की सराहना की.

स्ट्रोक के खतरे से बचा जा सकता है

रिसर्च के मुताबिक समय पर बीमारी का पता लगाकर मरीज को एनटीटीएनएफ इंजेक्शन मिल जाए तो स्ट्रोक के खतरे से बचा जा सकता है. इससे शरीर के अन्य अंगों पर अच्छे रिजल्ट देखने को मिले हैं.

प्रो. अमन के अनुसार इस बीमारी में ब्लड की नाड़ियों में सूजन आने और शरीर के अन्य अंगों पर विपरीत असर पड़ने लगता है. रिसर्च के मुताबिक इस इंजेक्शन का अन्य अंगों पर पॉजिटिव संकेत मिलना भी उपलब्धि है. उन्होंने बताया कि रिसर्च पर काम 2017 में शुरू किया गया था. अब रिसर्च पूरी होने पर इसे रिसर्च जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

क्या है एडीए-2 ?

एडेनोसिन डेमिनमिनस 2 (एडीए 2) एक प्रकार का आनुवांशिक विकार है. जिस मरीज में एडेनोसिन डेमिनमिनस 2 (एडीए 2) नामक एंजाइम या प्रोटीन की कमी होती है, शरीर के ऊतकों, विशेष रूप से रक्त वाहिकाओं को बनाने वाले ऊतकों में सूजन हो जाती है.

Cerebrospinal Fluid Test : सीएसएफ टेस्ट (CSF Test) क्या है?

Cerebrospinal Fluid Test : सीएसएफ टेस्ट (CSF Test) क्या है?

सीएसएफ टेस्ट एक ऐसा परीक्षण है जिसका प्रयोग यह लगाने के लिए किया जाता है की आपके मस्तिष्क और रीढ़ को क्या प्रभावित कर रही है। सीएसएफ (CSF) को सेरेब्रोस्पाइनल द्रव (Cerebrospinal fluid) कहते हैं। सीएसएफ टेस्ट सैंपल के आधार पर एक लैब में पूरा किया जाता है।

बता दें की CSF एक ऐसा फ्लूइड है जो आपके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central nervous system) को न्यूट्रिशन देता है। सीएनएस आपके मस्तिष्क(Brain) और रीढ़ की हड्डी(spinal cord) से जुड़े हुए होते हैं।

सीएसएफ (CSF) कोरॉइड प्लेक्सस के माध्यम से आपके मस्तिष्क(Brain) में बनता है और फिर आपके बल्ड फ्लो में दोबारा मिल जाता है। इस दौरान फ्लूइड को हर कुछ घंटों में पूरी तरह से बदल दिया जाता है। यह आपके मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को न्यूट्रिशन देने के अलावा, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के कॉलम के चारों ओर बहती है, और उसको सुरक्षा प्रदान करती है वहां जमा कचरे को बाहर ले जाने में मदद करती है। आपका लम्बर पंक्चर किस प्रकार काम कर रहा है इसके आधार पर CSF सैंपल जमा किया जाता है, जिसे स्पाइनल टैप के रूप में भी जाना जाता है। लिए गए सैंपल से इन सभी का जांच किया जा सकता है।

CSF आपके मस्तिष्क और रीढ़ के सीधे संपर्क में आते हैं। इसलिए सीएनएस लक्षणों को समझने के लिए बल्ड टेस्ट की तुलना में सीएसएफएनालिसिस अधिक प्रभावी माला जाता है। हालांकि, रक्त सैंपल की तुलना में रीढ़ की हड्डी के फ्लूइड का सैंपल प्राप्त करना अधिक कठिन है। सुई द्वारा रीढ़ की हड्डी से फ्लूइड निकालने के लिए उस व्यक्ति को आपके शरीर के एनाटोमी के बारे में और मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी की स्थिति को समझऩे का भरपूर ज्ञान होना बेहद आवश्यक है,क्योंकि इस प्रक्रिया में कुछ जटिलताएं खतरा बढ़ा सकती है।

सैंपल कैसे लिया जाता है

सीएसएफ सैंपल कैसे लिया जाता है

इस प्रक्रिया को करने ADA क्या है में आमतौर पर 30 मिनट से कम समय लगता है। इस प्रक्रिया को एक खास डॉक्टर द्वारा किया जाता है जिनको सीएसएफ से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई होती है।

-CSF आमतौर पर आपके निचले भाग रीढ़ से लिया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान आपका पूरी तरह से बने रहना बहुत जरुरी है क्योंकि इस प्रक्रिया में यदि आप अपनी जगह से इधर-उधर होते हैं तो फ्लूइड निकालने वाली सुई गलत जगह पर पड़ सकता है जिससे आपकी रीढ़ की हड्डी को नुकसान हो सकता है।

-आप रीढ़ की हड्डी के साथ नीचे की तरफ झुकेंगे और आपके घुटने आपके चेस्ट तक खिंचे होंगे। अपनी रीढ़ को मोड़ना पीठ के निचले हिस्से में आपकी हड्डियों के बीच एक जगह बनाता है।

-एक बार जब आप स्थिति में हैं, अपनी पीठ को एक सॉल्यूशन से साफ किया जाता है। आयोडीन अक्सर सफाई के लिए प्रयोग किया जाता है। वह सल्यूशन पूरी प्रक्रिया के दौरान बना रहता है। इससे आपको संक्रमण का खतरा कम होता है।

-एक क्रीम या किसी प्रकार का स्प्रे आपकी त्वचा पर अप्लाई किया जाता है। इसके बाद डॉक्टर आपको एनेस्थीसिया दे देता है। जब वह जगह पूरी तरह से सुन्न हो जाती है, तो आपका डॉक्टर दो कशेरुकाओं (Vertebrae) के बीच एक पतली सुई डालता है। सुई का मार्ग दर्शन करने के लिए एक विशेष प्रकार के एक्स-रे का प्रयोग किया जाता है जिसे फ्लोरोस्कोपी कहा जाता है।

-स्कल के अंदर दबाव एक मेनोमीटर के उपयोग से मापा जाता है। उच्च और निम्न दोनों CSF दबाव कुछ स्थितियों के संकेत हो सकते हैं।

-फ्लूइड सैंपल फिर सुई के माध्यम से लिए जाते हैं। जब फ्लूइड निकालने की क्रिया पूरी हो जाती है, तो सुई निकाल दी जाती है। उस जगह को फिर से साफ किया जाता है।वहां पट्टी लगा दिया जाता है।

सैंपल को कैसे उपयोग किया जाता है?

आपके मस्तिष्कमेरु (cerebrospinal) फ्लूइड में क्या है, यह आपके डॉक्टर को कई अलग-अलग बीमारियों की पहचान करने में मदद कर सकता है। यदि आपके पास इम्यूनोग्लोबुलिन नाम के पदार्थ का उच्च स्तर है, जिसका उपयोग आपका शरीर बीमारी से लड़ने के लिए करता है। यदि आपके डॉक्टर को लगता है कि आपको अल्जाइमर रोग या किसी अन्य प्रकार का पागलपन है, तो ऐसे रोग से जुड़े कुछ प्रकार के प्रोटीन फ्लूइड में हो सकते हैं। डिस्लेरेटेड फ्लूइड मस्तिष्क रक्तस्राव या स्ट्रोक का संकेत हो सकता है। बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के संकेत आपके डॉक्टर को बता सकते हैं कि आपको मेनिन्जाइटिस या एन्सेफलाइटिस जैसी बीमारी है कि नहीं।

डायबिटीज़ में ज़रूरी है HbA1c टेस्ट की जानकारी

HbA1c यानी हीमोग्लोबिन A1c. यह लैब में होने वाला एक ब्लड टेस्ट होता है, जो डॉक्टर की सलाह पर कम से कम तीन महीनों के अंतराल में कराया जाता है. यह टेस्ट ब्लड शुगर लेवल की जांच करने के लिए बिना खाना खाए और खाना खाने के बाद किए जाने वाले टेस्ट से अलग है. यह उन टेस्ट के मुकाबले ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है जिनसे सिर्फ़ खाने से ठीक पहले या बाद में ब्लड शुगर लेवल की जानकारी मिलती है. HbA1c से लंबे समय के दौरान ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव की जानकारी मिलती है.

कैसे काम करता है HbA1c टेस्ट?

आपने यह तो सुना होगा कि हीमोग्लोबिन का संबंध आपके आयरन लेवल और अनीमिया से है, लेकिन यह डायबिटीज़ से किस तरह जुड़ा है?

जब आपके ख़ून में शुगर लेवल बढ़ता है, तो ग्लूकोज़, हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन तैयार करता है. HbA1c टेस्ट जिसे ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट भी कहते हैं, इस ग्लूकोज़ से जुड़े हीमोग्लोबिन की मात्रा नापता है. इस टेस्ट के लिए उंगली की बजाए, नसों से निकाले गए ख़ून के सैंपल का इस्तेमाल किया जाता है.

यह सामान्य ब्लड शुगर टेस्ट से अलग कैसे है?

HbA1c टेस्ट में, ख़ून में मौजूद ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन की मात्रा की जांच करके ADA क्या है पिछले 3 महीनों का औसत ब्लड ग्लूकोज़ लेवल का पता लगाया जाता है. जब आप ख़ुद ब्लड शुगर लेवल की जांच करते हैं, तो इससे सिर्फ़ टेस्ट के वक्त का ब्लड ग्लूकोज़ लेवल पता चलता है.

इसके अलावा, HbA1c टेस्ट दिन के किसी भी वक्त करवाया जा सकता है, इसके लिए खानपान से जुड़ी कोई पाबंदी नहीं होती. जबकि सामान्य टेस्ट जैसे कि फ़ास्टिंग ब्लड शुगर (एफबीएस) और ओरल ग्लूकोज़ टॉलेरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) के लिए खानपान से जुड़ी पाबंदियां होती हैं.

वीडियो देखें: हाई ब्लड शुगर लेवल पर कैसे क़ाबू करें.

इसकी क्या ज़रूरत है?

HbA1c टेस्ट के नतीजे से किसी व्यक्ति के पिछले 3 महीने के ब्लड शुगर का पता लगाया जा सकता है. इससे डॉक्टर को आपकी स्थिति की जानकारी मिलती है और वह तय कर पाते हैं कि अच्छे ग्लूकोज़ कंट्रोल के लिए आपके इलाज में बदलाव किए जाने चाहिए या नहीं.

HbA1c टेस्ट का इस्तेमाल टाइप 2 डायबिटीज़ की स्क्रीनिंग और पहचान के लिए किया जाता है. इसका इस्तेमाल कई दिनों के ग्लूकोज़ लेवल पर नज़र रखने के लिए भी किया जाता है. इसकी मदद से डॉक्टर आपके लिए सही डायबिटीज़ का इलाज तय कर पाते हैं.

टेस्ट से यह भी जानकारी मिलती है कि क्या स्थिति में सुधार आया है, जैसे कि डायबिटीज़ के कुछ लक्षण ठीक हो गए हैं या सभी लक्षण ख़त्म हो चुके हैं. या दवाइयों/इंसुलिन की ज़रूरत बदल गई है.

कितने समय में यह टेस्ट करवाना चाहिए?

जब आपको HbA1c टेस्ट की सलाह दी जाएगी, तब आपके डॉक्टर आपको इस बात की जानकारी देंगे. HbA1c टेस्ट के लिए आमतौर पर आपको नीचे दी गई सलाह दी जाती है: [1]

  • अगर आपका ब्लड शुगर सामान्य है – साल में कम से कम 2 बार
  • अगर आपका ब्लड शुगर सामान्य से ज़्यादा है– एक साल में चार बार
  • अगर आपका ब्लड शुगर लेवल लगातार कम ज़्यादा होता रहता है या आप इंटेंसिव थेरेपी लेते हैं – साल में चार से ज़्यादा बार

टेस्ट नतीजों का मतलब [2]

टेस्ट के नतीजे आमतौर पर प्रतिशत में होते हैं. बिना डायबिटीज़ वाले व्यक्ति का HbA1c लेवल 4.0% से 5.6% तक होता है.

टेस्ट के नतीजे संकेत
5.7% से कम डायबिटीज़ नहीं है
5.7 से 6.4% डायबिटीज़ का जोखिम है (प्री-डायबिटीज़)
≥6.5% (दो अलग-अलग टेस्ट पर) डायबिटीज़


डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों को HbA1c की किस रेंज का लक्ष्य बनाना चाहिए?

आपके डॉक्टर आपको बताएंगे कि आपका लक्षित HbA1c लेवल क्या होना चाहिए. आमतौर ADA क्या है पर 7% से कम के लेवल तक पहुंचने का लक्ष्य होता है. हालांकि, ध्यान रखना चाहिए कि इस लक्ष्य को पाने के लिए आपका शुगर लेवल बहुत कम (हाइपोग्लाइसीमिया) न हो जाए.

सख़्ती से 6.5% से कम के लक्ष्य का सुझाव तब दिया जाता है, अगर: [3]

  • आपको हाल ही में डायबिटीज़ हुआ है
  • आपका इलाज जीवनशैली में बदलाव या ‘मेटफॉर्मिन’ के साथ किया जा रहा है
  • आपको दिल या ख़ून से जुड़ी कोई बड़ी समस्या नहीं है

8% से ज़्यादा न होने वाला लक्ष्य का सुझाव तब दिया जाता है, अगर: [3]

  • पहले कभी गंभीर हाइपोग्लाइसेमिया का इतिहास
  • डायबिटीज़ से जुड़ी समस्याएं
  • साथ में होने वाली दूसरी समस्याएं
  • लंबे वक्त से बनी हुई डायबिटीज़ की समस्या जिसमें ब्लड शुगर को सामान्य लेवल तक लाने में परेशानी हो

टेस्ट के नतीजे में बहुत ज़्यादा रीडिंग आने का क्या मतलब है?

अगर आपको डायबिटीज़ है, तो इस टेस्ट से डायबिटीज़ से जुड़ी समस्याओं के जोखिम का पता लगाने में मदद मिलती है. जितना ज्यादा HbA1c होगा, उतना ज़्यादा जोखिम होगा.

उदाहरण के लिए, 7% से कम HbA1C से पता चलता है कि आपको डायबिटीज़ से जुड़ी समस्याएं जैसे डायबिटिक रेटीनोपैथी (आंख की बीमारी) या डायबिटिक नेफ़रोपैथी (किडनी की बीमारी) आदि होने का ज़्यादा जोखिम है.

लेकिन अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि आपके HbA1c लेवल में 1% की कमी भी नीचे दी गई समस्याओं के जोखिम में कई प्रतिशत की कमी ला सकती है: [5]

· इस्कीमिक हार्ट डिज़ीज़ 16%

· ऐम्प्यूटेशन और पेरिफेरल वैस्कुलर डिज़ीज़ 43%

· आंखों की बीमारी 21-24% प्रतिशत

· सभी तरह की माइक्रो वैस्कुलर बीमारियां 37%

HbA1c लेवल ज़्यादा है, तो उसे कम करने के लिए क्या करें?

अपने डॉक्टर से सलाह लें, वह आपको आपके हिसाब से HbA1c लेवल कम करने के लिए अलग-अलग तरीके बताएंगे.

आमतौर पर, डॉक्टर आपको आपके शुगर लेवल पर नज़र रखने, सेहतमंद जीवनशैली अपनाने, खान-पान में बदलाव करने, रोज़ाना एक्सरसाइज़ करने और वज़न घटाने की सलाह देंगे. आपकी दवाइयां भी बदली जा सकती हैं.

हो सकता है कि अपना ख़याल रखने की ज़िम्मेदारी बहुत बड़े काम की तरह लगे. इससे तनाव और अवसाद भी हो सकता है. ख़याल न रख पाने पर आपको ख़ुद पर बहुत ज़्यादा गुस्सा भी आ सकता है. लेकिन इससे आपको कोई ADA क्या है फायदा नहीं होगा. इसलिए, अपने प्रति दयालु और नम्र बनें. रैंडम तरीके से किए गए एक परीक्षण में पाया गया कि जो लोग ख़ुद के साथ थोड़ी नरमी बरतते हैं, वे अपना HbA1C लेवल 1% तक कम कर सकते हैं. [6] बीमारी की हालत में ख़ुद के लिए अच्छा सोचने से आप न सिर्फ़ अवसाद और तनाव को, बल्कि अपने HbA1c लेवल को भी कम कर सकते हैं.

  1. American Diabetes Association (ADA) 2017 Guidelines http://care.diabetesjournals.org/content/diacare/suppl/2016/12/15/40.Supplement_1.DC1/DC_40_S1_final.pdf
  2. National Diabetes Education Initiative http://www.ndei.org/ADA-2013-Guidelines-Criteria-Diabetes-Diagnosis.aspx.html
  3. National Diabetes Education Initiative http://www.ndei.org/ADA-diabetes-management-guidelines-glycemic-targets-A1C-PG.aspx.html
  4. Nordwall M, Arnqvist HJ, Bojestig M, Ludvigsson J. Good glycemic control remains crucial in prevention of late diabetic complications–the Linköping Diabetes Complications Study. Pediatr Diabetes. 2009 May;10(3):168-76. doi: 10.1111/j.1399-5448.2008.00472.x. Epub 2008 Oct 22. PubMed PMID: 19175900.
  5. Stratton IM, Adler AI, Neil HA, Matthews DR, Manley SE, Cull CA, et. al, BMJ, 2000, 321(7258):405-12.
  6. Friis AM, Johnson MH, Cutfield RG, Consedine NS. Kindness Matters: A Randomized Controlled Trial of a Mindful Self-Compassion Intervention Improves Depression, Distress, and HbA1c Among Patients With Diabetes. Diabetes Care. 2016 Nov;39(11):1963-1971. Epub 2016 Jun 22. PubMed PMID: 27335319.

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इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देती है एडीए की कमी, 6 महीने की उम्र से पहले ही दिखाई देने लगते हैं इसके लक्षण

Kishori Mishra

Written by: Kishori Mishra Published at: Nov 11, 2020 Updated at: Nov 11, 2020

इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देती है एडीए की कमी, 6 महीने की उम्र से पहले ही दिखाई देने लगते हैं इसके लक्षण

शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने से व्यक्ति कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली कई कारणों से कमजोर हो सकती है, इसमें से एक कारण है एडीनोसिन डेमिनमिनस सीवियर कंबाइंड इम्यूनोडेफिशिएंसी (एडीए की कमी)। यह एक अनुवांशिक समस्या है। इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली इतनी ज्यादा कमजोर हो जाती है कि वह मामूली से संक्रमण से लड़ने में असमर्थ होता है। ये सीवियर कंबाइंड इम्यूनोडेफिशिएंसी (एससीआईडी) का सामान्य कारण होता है। एक्सपर्ट के अनुसार, एडीए के अधिकांश मामलों में इसके लक्षण 6 महीने की उम्र से पहले दिखाई देने लगते हैं। यह एक बहुत ही गंभीर समस्या साबित हो सकती है। क्योंकि यह बहुत ही कम उम्र में लोगों को अपना शिकार बना लेती है। हालांकि, इसका इलाज संभव है, इसलिए घबराने की बात नहीं है।

विशेषज्ञों की मानें तो अगर समय रहते इसके लक्षणों को पहचान लिया गया, तो इसका इलाज संभव है। खासतौर पर अगर संक्रमित होने से पहले व्यक्ति का इलाज किया गया, तो इसका इलाज आसान हो जाता है और व्यक्ति अपना जीवन लंबा और स्वस्थ जी सकता है। वहीं, अगर इस बीमारी का इलाज समय से पहने नहीं कराया गया, तो व्यक्ति के शरीर में संक्रमण से लड़ने की क्षमता पूर्णत: खत्म हो जाती है, जो आगे जाकर और अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।

एडीए-एससीआईडी के लक्षण

यह बीमारी शिशुओं को होती है। इस बीमारी के लक्षण 6 महीने की उम्र से ही दिखने लगते हैं। इस बीमारी से प्रभावित शिशु के शरीर में संक्रमण विभिन्न हिस्सों में फैल जाते हैं। ऐसे में उनके लक्षणों को पहचानकर तुरंत डॉक्टर्स से संपर्क करें। शिशु के मुंह, कान, नाक, स्किन, फेफड़े और स्किन पर इसके संक्रमण दिख सकते हैं।

शिशुओं के शरीर के इन हिस्सों में संक्रमण दिखना आम बात है, लेकिन अगर आपको इस तरह के लक्षण दिखे, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं। गंभीर और लंबे समय तक दिखने वाले ये लक्षण शिशु के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

एडीए-एससीआईडी के कारण

यह एक अनुवांशिक समस्या है। यह बीमारी माता-पिता के जीन खराब होने के कारण शिशु को कहती है। जीन में खराबी के कारण एडीए की कमी होती है। शरीर मेंं ये जीन कोशिकाओं के अंदर होते हैं। जो खासकर व्हाइट ब्लड कोशिकाओं (लिम्फोसाइट्स) में पाया जाता है। लिम्फोसाइट्स इम्यून सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा होती है। यह हमारे शरीर को बैक्टीरिया से बचाता है।

कैसे होता है एडीए-एससीआईडी?

  • इस समस्या के इलाज के लिए डॉक्सर सबसे पहले मौजूदा संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक, एंटीवायरस और एंटीफंगल की दवाइयां देते हैं।
  • इसके अलावा संक्रमण से बचाव के लिए एंटीबायोटिक्स दवाइयां देते हैं।
  • एस बीमारी से पीड़ित शिशु को अस्पताल के अलर कमरे में कुछ समय के लिए बिताना पड़ता है। हालांकि, शिशु के साथ माता-पिता रह सकते हैं। हालांकि, ऐसा करने से शिशु ठीक नहीं होते हैं, लेकिन एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूर करने का काम करती है। इससे संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। इसके अलावा प्रभावित शिशु को इंजेक्शन दिया जाता है।

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